ट्रांसफार्मर का तेल चोरी, आखिर कहां खप रहा है? बिशन नगर की वारदात ने खड़े किए बड़े सवाल


पटियाला। बिशन नगर में बिजली ट्रांसफार्मर से तेल चोरी होने की घटना ने केवल बिजली व्यवस्था की सुरक्षा पर ही सवाल नहीं उठाए हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि आखिर चोरी किया गया ट्रांसफार्मर ऑयल जाता कहां है और इसे खरीदने वाला कौन है?
इलाके में ट्रांसफार्मर से तेल चोरी होने के कारण बिजली आपूर्ति बाधित हुई और लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे पहले भी आसपास के इलाकों में कई ट्रांसफार्मरों से तेल चोरी हो चुका है। ऐसे में बार-बार होने वाली घटनाओं को महज छोटी-मोटी चोरी मानना गंभीर चूक साबित हो सकती है।
चोरों से आगे खरीदारों तक पहुंचे जांच

सबसे बड़ा सवाल यह है कि चोर इतनी मेहनत करके तेल निकालने के बाद उसे कहां बेचते हैं। क्या इसके पीछे कोई स्थानीय कबाड़ी, बिचौलिया या इस्तेमाल किए गए तेल का कारोबारी नेटवर्क सक्रिय है? पुलिस यदि केवल चोरी करने वालों को पकड़कर जांच बंद कर देती है तो चोरी के बाजार की असली कड़ी सामने नहीं आएगी।
पंजाब में पहले भी ट्रांसफार्मर ऑयल चोरी करने वाले गिरोह का मामला सामने आ चुका है। अमृतसर में पुलिस ने एक गिरोह को पकड़ने के बाद बताया था कि चोरी का तेल आगे ट्रांसपोर्टरों और ऑटो-रिक्शा चालकों को बेचा जाता था। पुलिस के अनुसार उस गिरोह ने बड़ी संख्या में वारदातें कबूल की थीं।
फैक्ट्रियों तक पहुंचता है या नहीं?

ट्रांसफार्मर ऑयल का इस्तेमाल बिजली के ट्रांसफार्मरों में इन्सुलेशन और कूलिंग के लिए होता है। उद्योगों में भी ऑयल-फिल्ड ट्रांसफार्मर इस्तेमाल होते हैं। बाजार में इस्तेमाल किए गए ट्रांसफार्मर ऑयल की खरीद-बिक्री और रीसाइक्लिंग का वैध कारोबार भी मौजूद है। इसलिए पुलिस के लिए यह जांच महत्वपूर्ण हो सकती है कि चोरी का तेल किसी औद्योगिक इकाई, गैर-अधिकृत रीसाइक्लर, कबाड़ी या अन्य खरीदार तक तो नहीं पहुंच रहा।

हालांकि, बिशन नगर से चोरी हुआ तेल किसी फैक्ट्री में ही जा रहा है, ऐसा फिलहाल बिना जांच के कहना उचित नहीं होगा। इस दिशा में ठोस सबूत मिलने के बाद ही दावा किया जा सकता है।
वैध और अवैध तेल के कारोबार में फर्क

PSPCL के पुराने रिकॉर्ड में इस्तेमाल/गंदे ट्रांसफार्मर ऑयल की बाकायदा नीलामी का उल्लेख मिलता है और इसके लिए अधिकृत रीसाइक्लर/री-प्रोसेसर तथा संबंधित पर्यावरणीय मंजूरियों की शर्तें भी रखी गई थीं।
यानी इस्तेमाल किए गए ट्रांसफार्मर ऑयल का वैध निपटान और रीसाइक्लिंग एक अलग प्रक्रिया है। सवाल यह है कि यदि किसी ट्रांसफार्मर से रात के अंधेरे में चोरी करके तेल निकाला गया, तो वह किस चैनल में प्रवेश करता है?
पुलिस के सामने जांच के ये सवाल

• बिशन नगर में अब तक कितने ट्रांसफार्मरों से तेल चोरी हुआ?
• क्या सभी घटनाओं में चोरी का तरीका एक जैसा है?
• क्या घटनास्थल के आसपास लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली गई?
• चोरी के तेल को खरीदने वाले स्थानीय बिचौलियों या कबाड़ियों की जांच हुई?
• क्या आसपास के औद्योगिक इलाकों में संदिग्ध तरीके से ट्रांसफार्मर ऑयल खरीदने-बेचने वालों की पहचान की गई?
• क्या पिछले मामलों में बरामद तेल के स्रोत और खरीदारों की जानकारी मिली थी?
बिजली चोरी नहीं, जनता की परेशानी भी

ट्रांसफार्मर से तेल चोरी का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है। तेल कम होने से ट्रांसफार्मर की कूलिंग और इन्सुलेशन प्रभावित हो सकते हैं और बिजली आपूर्ति बाधित होने के साथ उपकरण के खराब होने का खतरा बढ़ सकता है।
पंजाब में ट्रांसफार्मर और विद्युत उपकरणों की चोरी पहले से ही बड़ी समस्या रही है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 से 2025-26 के बीच पंजाब में 1.34 लाख से अधिक ट्रांसफार्मर/विद्युत उपकरण चोरी की घटनाएं दर्ज हुईं और PSPCL को ₹1,003 करोड़ से अधिक का नुकसान बताया गया है।
अब जरूरत सिर्फ चोर पकड़ने की नहीं, बल्कि उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचने की है जो चोरी के सामान को खरीदता और आगे खपाता है। बिशन नगर की घटना इसी बड़े सवाल की ओर इशारा कर रही है—“ट्रांसफार्मर से निकला तेल आखिर जाता कहां है?”
शहर में असंख्य CCTV कैमरे, फिर भी ट्रांसफार्मर तेल चोरों का सुराग क्यों नहीं?
बिशन नगर में ट्रांसफार्मर से तेल चोरी की घटना ने बिजली व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में CCTV कैमरे लगे होने के बावजूद यदि बार-बार ट्रांसफार्मरों से तेल चोरी हो रहा है और आरोपियों तक पुलिस नहीं पहुंच पा रही, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन कैमरों का फायदा जांच में क्यों नहीं मिल रहा?
ट्रांसफार्मर से तेल चोरी करना कोई कुछ मिनटों में होने वाली साधारण घटना नहीं है। आरोपियों को घटनास्थल तक पहुंचना, वाहन खड़ा करना, तेल निकालना और फिर उसे लेकर निकलना पड़ता है। इस दौरान वे किसी न किसी सड़क, गली, चौराहे या अन्य CCTV कैमरे के दायरे से गुजर सकते हैं।
ऐसे में जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह होना चाहिए कि घटनास्थल से आरोपियों के संभावित आने-जाने के रास्ते की CCTV फुटेज को क्रमवार खंगाला जाए।
कैमरे हैं तो फिर पहचान क्यों नहीं?
स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि इलाके और मुख्य मार्गों पर CCTV कैमरे काम कर रहे हैं, तो घटना वाली रात की फुटेज में संदिग्ध वाहन या लोगों की गतिविधियां क्यों नहीं दिखाई दीं?
क्या सभी कैमरे उस समय चालू थे?
क्या उनकी रिकॉर्डिंग सुरक्षित है?
क्या पुलिस ने घटनास्थल से निकलने वाले सभी संभावित रास्तों की फुटेज जांची?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी संदिग्ध वाहन का नंबर सामने आया है?
सिर्फ घटनास्थल का कैमरा काफी नहीं
पुलिस के लिए जांच का दायरा केवल उस ट्रांसफार्मर के आसपास लगे कैमरों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। चोरों के आने और जाने के संभावित रास्तों पर लगे कैमरों की फुटेज को जोड़कर देखा जाए तो वाहन की गतिविधियों का पूरा रूट सामने आ सकता है।
यदि एक ही इलाके में पहले भी ट्रांसफार्मरों से तेल चोरी हुआ है, तो पुरानी घटनाओं की CCTV फुटेज और वारदात के तरीके की तुलना करना भी अहम हो सकता है।
असली सवाल: कैमरों का नेटवर्क कितना उपयोगी?
CCTV कैमरे लगाना सुरक्षा व्यवस्था का पहला कदम है। असली परीक्षा तब होती है जब कोई अपराध होता है और फुटेज से आरोपी तक पहुंचा जाता है।
बिशन नगर की घटना में पुलिस के सामने सिर्फ यह पता लगाना चुनौती नहीं है कि तेल किसने चुराया, बल्कि यह भी पता लगाना है कि चोर किस वाहन से आए, किस रास्ते से निकले और चोरी का तेल आखिर किसके पास पहुंचा।
अगर कैमरों की फुटेज उपलब्ध है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि जांच एजेंसियां उसे तकनीकी तरीके से जोड़कर आरोपियों तक पहुंचेंगी। और यदि कैमरे मौजूद होने के बावजूद फुटेज उपलब्ध नहीं है या कैमरे काम नहीं कर रहे थे, तो यह भी एक अलग गंभीर सवाल है।
शहर में CCTV कैमरों का जाल है, फिर भी ट्रांसफार्मर तेल चोरी की घटनाएं जारी हैं—ऐसे में जनता जानना चाहती है कि समस्या कैमरों की संख्या में है, उनकी निगरानी में है या फिर जांच के तरीके में?