भीमवादियों का ‘मास्टरप्लान’ फुस्स: ब्राह्मण हटाओ के नारे लगाने चले थे, और अपनी ही गर्दन पर चलवा बैठे उस्तरा


दिल्ली की सियासत में गजब का तमाशा चला! तथाकथित ‘भीमवादियों’ और नकली क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों ने सोचा था कि जंतर-मंतर के मंच से “ब्राह्मण हटाओ” और संघ-हिंदू देवी-देवताओं को गालियों की घुट्टी पिलाकर वे सरकार को घुटनों पर ले आएंगे। लेकिन साहब, खेल ऐसा पलटा कि इन बुद्धिजीवियों का यह कथित क्रांतिकारी प्लान ‘उल्टी गंगा बहने’ जैसा साबित हुआ और उनके अपने ही बुने जाल में उनकी ऐसी फजीहत हुई कि पूछिए मत! भीमवादियों का सोचा हुआ गणित कुछ यूं था कि मंच से जितना तीखा जहर उगला जाएगा, समाज में उतना ही विरोध फैलेगा।
लेकिन जैसे ही माइक से संघ (RSS), ब्राह्मणों और हिंदू आस्था पर अमर्यादित टिप्पणियां हुईं, वैसे ही देश के बहुसंख्यक समाज और हिन्दू वर्ग की त्यौरियां चढ़ गईं।
नतीजा यह हुआ कि जिस जनता को वे अपने पक्ष में करने चले थे, उसने उल्टे ब्राह्मणों और आरएसएस के साथ गहरी हमदर्दी जतानी शुरू कर दी। यानी, निशाना लगाने चले थे सामने वाले पर, और तीर लग गया खुद के ही पैरों पर!इस पूरी नौटंकी का सबसे मजेदार और चटपटे ट्विस्ट ने तो भीमवादियों के होश ही उड़ा दिए।
सरकार ने इस “सहानुभूति के माहौल” को भांपते हुए बिना एक पल गंवाए, ओबीसी कोटे से आने वाले धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से तुरंत चलता कर दिया।
और सोने पर सुहागा यह हुआ कि खाली हुई कुर्सी पर संघ के पक्के सिपाही और ब्राह्मण समुदाय के तेज-तर्रार नेता प्रह्लाद जोशी को लाकर बैठा दिया गया। अब आलम यह है कि जो भीमवादी जंतर-मंतर पर जश्न मनाने की तैयारी कर रहे थे, वे खुद अपने सिर पर हाथ रखकर बैठ गए हैं। ब्राह्मण विरोध के नाम पर ऐसा जोरदार सेल्फ-गोल दागा गया कि शिक्षा मंत्रालय की पूरी की पूरी कमान सीधे संघ के खाते में और एक ब्राह्मण नेता के हाथ में चली गई।इसे ही कहते हैं— चले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास! भीमवादियों की इस नासमझ जिद ने खुद अपनी ही चाल को ऐसा उल्टा किया कि हिंदुत्व और ब्राह्मण विरोध का गुब्बारा फुस्स हो गया और भगवा खेमा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होकर उभर आया जिसे देख विरोधी भी सोच में पड़ गए हैं कि आखिर ‘शिकार’ कौन हुआ और ‘शिकारी’ कौन बना? इस सहानुभूति वाले तूफानी माहौल का फायदा उठाने में बीजेपी का चाणक्य तंत्र तनिक भी पीछे नहीं रहा।
ओबीसी चेहरे की छुट्टी: पेपर लीक और व्यवस्था के दबाव का रोना रोते हुए, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आने वाले कद्दावर मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री की कुर्सी से ससम्मान किनारे कर दिया गया। सोशल मीडिया के चटोरों का तो यहां तक कहना है कि प्रधान जी इस पूरे खेल में अनजाने में ही सही, मोहरा बनकर रह गए।
संघ के ‘कड़क सिपाही’ की एंट्री: कुर्सी खाली होते ही संघ परिवार के सबसे अनुशासित और धारदार चेहरों में शुमार, ब्राह्मण समुदाय के दिग्गज नेता प्रह्लाद जोशी को देश के शिक्षा मंत्रालय की कमान सौंप दी गई। यानी आम के आम और गुठलियों के दाम! राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को सबसे बड़ा ‘सेल्फ-गोल’ या कहें कि अपनी गर्दन पर खुद उस्तरा चलाना बताया जा रहा है। चर्चा यह है कि सरकार पर दबाव बनाने के चक्कर में जो स्क्रिप्ट लिखी गई थी, उसने अंततः सत्ता पक्ष को ही ऐसा अचूक सियासी हथियार दे दिया जिससे एक झटके में विरोध की हवा भी निकल गई और शिक्षा मंत्रालय की मलाईदार कुर्सी पर संघ का चहेता ब्राह्मण चेहरा भी काबिज हो गया। अब सियासत के इस मसालेदार खेल पर आगे क्या-क्या गुल खिलते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा