बेचारा पप्पू फिर फेल : चीफ जस्टिस का विरोध करके कांग्रेस औंधे मुंह गिरी

कई लोगों को लगता है कि कांग्रेस ने जल्दबाज़ी में अपनी ही किरकिरी करा ली.

कई ऐसी बातें सामने आई हैं जिनसे साफ़ होता है कि कांग्रेस ने महाभियोग का नोटिस देने में गंभीरता नहीं दिखाई.

इस महाभियोग नोटिस पर कांग्रेस समेत सात दलों के 71 सांसदों के हस्ताक्षर थे. नमो टी वी ने कल बताया था की कि इनमें से सात रिटायर्ड सांसदों के भी हस्ताक्षर थे.

आख़िर ऐसा क्यों हुआ? वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का कहना है कि महाभियोग पर पहले से ही सांसदों हस्ताक्षर करा लिए गए थे.

अब ऐसे में सवाल उठता है कि पहले हस्ताक्षर करा लिए गए थे तो उपराष्ट्रपति को सौंपते यह क्यों नहीं देखा गया कि इसमें रिटायर्ड सांसदों के भी हस्ताक्षर हैं.

बीजेपी का कहना है कि पहले से तैयार नोटिस को जज लोया पर आने वाले फ़ैसले तक इंतजार किया गया.

बीजेपी प्रवक्ता अमन सिन्हा का कहना है कि जब कांग्रेस को लगा कि जज लोया पर जस्टिस दीपक मिश्रा वाली बेंच का फ़ैसला उनके पक्ष में नहीं है तो उपराष्ट्रपति को महाभियोग को नोटिस थमा दिया.

सिन्हा का कहना है कि ऐसे में शक होना लाज़िमी है कि कांग्रेस बदले की भावना से काम कर रही है.

क्या कांग्रेस ने जिस वक़्त महाभियोग का नोटिस दिया उससे शक होता है?

देश के जाने-माने क़ानूनविद फली नरीमन ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग का नोटिस सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक काला दिन है.

फली नरीमन ने कहा कि उनकी 67 साल की उम्र में ऐसा कभी नहीं हुआ. उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला जस्टिस दीपक मिश्रा का विरोध सुप्रीम कोर्ट के चार जज जस्टिस चेमलेश्वर, जस्टिस रंजन गगोई, कुरियन जोसेफ और मदन लोकुर की लाइन से बिल्कुल अलग था.

नरीमन का कहना है कि उन चार जजों का विरोध बिल्कुल अलग था. उन्होंने कहा कि महाभियोग अति गंभीर क़दम है और उसे साबित करने के लिए आपके पास ठोस सबूत होने चाहिए.

कांग्रेस के भीतर भी इस महाभियोग को लेकर एक मत नहीं था. महाभियोग नोटिस के समर्थन में हस्ताक्षर किए गए सांसदों की सूची में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के नाम नहीं थे.

यूपीए सरकार में क़ानून मंत्री रहे सलमान खुर्शीद, अश्विनी कुमार और वीरप्पा मोइली के भी नाम नहीं थे. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल का कहना है कि चिदंबरम के ख़िलाफ़ अदालत में मामले चल रहे हैं इसलिए उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए थे.

ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस इतना अहम क़दम उठाने जा रही थी तो पार्टी के भीतर सीनियर नेताओं की राय क्यों बंटी हुई थी?

अब कांग्रेस महाभियोग का नोटिस स्वीकार नहीं किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रही है. अगर इस केस की सुनवाई भी जस्टिस दीपक मिश्रा की ही बेंच करती है तो एक संकट की स्थिति पैदा होगी. आख़िर कोई अपने ही ख़िलाफ़ केस की सुनवाई कैसे कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जस्टिस दीपक मिश्रा पर कई तरह के संदेह ज़ाहिर किए हैं. इसके साथ ही जजों की नियुक्ति पर कॉलेजियम की सिफ़ारिशों को सरकार मंज़ूरी नहीं दे रही है. इतना कुछ चल रहा है ऐसे में विपक्षी पार्टियों का शक होना लाजिमी है. अब हमें ये देखना है कि मामले को कैसे सुलझाया जाए.”

दीपक मिश्रा

 

सीजेआई के ख़िलाफ़ महाभियोग लाने के लिए कोई ठोस वजह नहीं थी और ऐसे में इसे अस्वीकार किया जाना सही क़दम है. अब राहुल गाँधी के नेत्रित्व के बचकानापन को लेकर सोशल साइट्स पर बाज़ार गरम हो गया है .

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